पुरुष / पति की आत्महत्या का कोई पुरसाहाल हाल नहीं

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अमर उजाला – लखनऊ – दिनांक 05-04-2015.
भारत में अपराध के आंकड़े आधिकारिक रूप से एकत्र करने वाली देशव्यापी संस्था ‘नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो’ की रिपोर्ट बताती हैं की विवाहित पुरुषो  की आत्महत्या डर (65000 लगभग) विवाहित महिलाओ की आत्महत्या डर (28000 लगभग) से दुगनी से भी ज्यादा है । विवाह की व्यवस्था में जब क्षय होता है तो स्त्री और पुरुष सामान्य रूप से प्रभावित होते हैं । यह बात सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर तो स्वीकार्य है पर कानून के स्तर पर यह बात सिरे से नकारी जाती है ।

एक और जहाँ महिलाओं को अपनी दुश्वारी कहने के तमाम कानून और संस्थाएं उपलब्ध हैं वहीँ पुरुषों के लिए विधिक स्तर पर अपनी बात कहने किसी प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं हैं । महिला थाना, परिवार समाधान केंद्र, घरेलू हिंसा अधिनियम, दहेज प्रतिषेध अधिनियम, भारतीय दण्ड विधान, अपराध प्रक्रिया विधा आदि सभी में महिलाओं के हित के हजारो रास्ते हैं । पुरुषो के लिए कुछ भी नहीं ।

समानता का अधिकार नैसर्गिक रूप से सभी को मिला है । फिर लिंग भेदी कानून और संस्थाओं को बना कर  क्यों पुरुषों को इस बराबरी हक से वंचित रखने के पीछे कौन सी शाजिश है ?

इस समाचार में अगर महिला ने अपने मइके में भी आत्महत्या की होती तो सब मिलकर  घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने आदि के मुकदमें दर्ज हो जाते । अब देखना यह है की इस आत्महत्या का कौन सा मुकदमा दर्ज होता है।

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