महिला कानूनों का दुर्पयोग / Misuse & Abuse of Women Laws

Much needed gesture in present time

Supreme Court to examine possibility of Domestic Violence on Men

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दहेज के फर्जी मुकदमें में मुर्दे भी नामज़द !

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यही है असली इंडिया ! देश की राजधानी से सटे और हाई-टेक माने जाने वाले गुड़गांव में एक व्यक्ति अपनी पत्नी से तंग आकर आत्महत्या करता है तो अबला मैडम पति के मरने के बाद जाकर हापुड़ में दहेज का फर्जी मुकदमा लिखा देती है । जिसमें मरे हुए पति को भी नामज़द कर लेती है ।

ज़िंदा लोगों पर ऐसे फर्जी मुकदमें का संकट तो सबको पता था पर अब हिन्दुस्तान में मुर्दे भी सुरक्षित नहीं रहे । क्या कोई खट्टर, मोदी या अखिलेश सुन रहा है ? है कोई माई का लाल ?

Men asking justice from Women’s Commission

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दिनांक 14.04.2015 को हिदुस्तान के ऋषिकेश संस्करण में छपी यह खबर तो बस एक बानगी भर है । वास्तव में हर पुरुष इस तुर्रे के निचे दबा होता है कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ । जितना भी दर्द छलक कर बाहर आया है वो तब हुआ होगा जब सारे आंसू भी सूख गए होंगे । आप स्वयं अपने पर बीते तो कल्पना कर के देखिये की मर्द को रोने के लिए कितने गहरी प्रताड़ना सहनी पड़ी होगी ।। मर्द का दर्द पहिचानिए । उसके प्रति भी सम्वेदनशील बनिए ।
औरतें भी अपराधी होती हैं इस बात स्वीकार्यता अभी समाज में कम है । पर अब बात निकली है तो दूर तलक जाए, ऐसा हमारा प्रयास है ।

Man forced to live in bus stop by wife gets divorce

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यही काम अगर किसी पति ने किया होता तो क्या सिर्फ तालाक देकर अदालते उसकी जान बख्श देती ? लिंग भेदी कानूनों के विरुद्ध आवाज बुलन्द करें ।

Rise in misuse of anti-dowry law in state worrying

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जानते सब हैं, मानते सब हैं पर कार्यवाही कोई नहीं करेगा। सही मायनों में सरकारें, प्रशासनिक व्यवस्था और अदालतें महिलाओं के फर्जी मुकदमों को प्रोत्साहन देती हैं । उनकी रोजी रोटी सच्चे मुकदमों से तो चलती नहीं, तो फर्जी से ही चला रहे हैं । अगर यह व्यवस्था इन फर्जी पीड़िताओं पर कठोर कार्यवाही कर दे तो फर्जी मुकदमों पर अंकुश लग सकता है ।

अगर यह जिलाधिकारी न होते हो क्या सफाई देने का मौक़ा मिलता ?

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हिंदुस्तान – लखनऊ । दिनांक 05.04.2015 ।
महिला कानूनों दुरूपयोग का यह आलम है कि अब कोई भी सुरक्षित नहीं है । सभी आम और ख़ास, पुरुष निशाने पर हैं । इस खबर में अगर आरोपी पुरुष जिलाधिकारी नहीं होता तो भी क्या उसे अपनी सफ़ाई देने का मौका मिलता ? जो रवायत इस देश में चल रही है उसमे तो बिना सच्चाई जाने सिर्फ आरोप मात्र लग जाने से ही पुरुषों को दोषी मान लेने का चलन है ।  नौकरी से निलम्बन, पुलिस – कचहरी के चक्कर और समाजिक तिरस्कार सब एक साथ मिलता है ।

आज कार्यालय में भी महिला कानूनों का दुरूपयोग खुलेआम हो रहा है । आफिस की हर छोटी – बड़ी बात कब ‘महिला उत्पीड़न’ और ‘कार्य स्थल पर यौनिक अत्याचार’ के मुकदमें में बदलकर लौटेगी,  इसी भय में भारत के हर कार्यालय में लोग भयाक्रांत हैं । उससे भी बड़ी समस्या यह है की जब यह मुकदमें झूठे साबित होते हैं तो फर्जी शिकायत करने वाली शातिर महिला पर कोई कार्यवाही नहीं होती । कानून में फर्जी शिकायत करने वालों पर दण्ड का प्राविधान नहीं होने की कमी के कारण महिलाओं में फर्जी मुकदमें दर्ज कराने की प्रवृत्ति की बाढ़ आ चुकी है । समाज में यह कुरीति एक विकराल रूप ले चुकी है ।

मुरादाबाद के ड़ा सन्जीव टण्डन ने भी खुद जीता दहेज का फर्जी मुकदमा, लाखों लोगों के लिए बने आशा की किरण !

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मुरादाबाद के दैनिक हिन्दुस्तान के मुख पुष्ठ पर  04-04-2015 को प्रकाशित यह खबर बताती है कि कैसे देश भर में फर्जी दहेज के मुकदमों ने युवा पीढ़ी और उनके माता – पिता और परिवार को अपनी गिरफ्त में ले रखा है । जीवन के जिस समय में अपने पेशे के हुनर को विकसित कर कुछ काम करके बिताना चाहिए, उस बेशकीमती समय को देश के डॉक्टर – इंजीनियर फर्जी मुकदमें लड़ने में बिता रहे है । अपना मूल काम – धाम छोड़ कर सपरिवार अदालतों के चक्कर काटना इनकी नियति बनती जा रही है। कल इंदौर के दैनिक भास्कर में इंजीनियर दीप्तांशु शुक्ला के संघर्ष की दास्ताँ पढ़ी और आज  मुरादाबाद के ड़ा संजीव टण्डन की आप – बीती । इन दोनों योद्धाओ की जितनी सरहाना की जाये कम होगी ।

इस देश में पुलिस, प्रशासन, वकील और अदालतों के साथ – साथ कानून बनाने वाले भी आँख बंद करके यह मानते हैं की सिर्फ महिलाएं ही पीड़ित है । जन – मानस के भाग्य-विधाता बने इन हाकिमों को दूसरे पक्ष की बात सुनने तक की जरूरत महसूस नहीं होती । पुरुष के विरुद्ध एकतरफा कार्यवाही के अधिकार वाले कानून रोज बनाये जा रहे हैं । उस देश में लम्बी अदालती लड़ाई में जीवन के दस – पन्द्रह साल लगा कर इन फर्जी मुकदमों को जीतना किसी भागीरथ प्रयास के बिना सम्भव नहीं है। जाने कितने ही लाखों ऐसे सन्जीव और दीप्तांशु आज भी देश की अदालतों में अपने को बेगुनाह करार दिए जाने की राह देख रहे होंगे । आपने इस लड़ाई को जीता, इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं । अपनी निजी लड़ाई से भी ज्यादा आप इस बात के लिए साधुवाद के पात्र हैं कि आपने अपने जैसे उन लाखों फर्जी मुकदमा पीड़ितों को एक नई राह दिखाई है । संघर्ष का मार्ग कठिन है पर इससे आप कुंदन बन कर निकले । पुन: बधाई !

एक और बड़ा प्रश्न है कि अब फर्जी मुकदमा करने वाली / वाले पर क्या कार्यवाही होनी चाहिये ? उन पर कानून का दुरूपयोग तो सिद्ध हो ही चुका है । साथ ही अवैध वसूली, धन उगाही, अदालतों को झूठ बोल के गुमराह कारना, दुसरो को क्षति पहुंचाने की नीयत से प्रायोजित होकर कानून का दुरूपयोग, मानहानि आदि – आदि, जैसे तमाम अपराध उस फर्जी मुकदमा वाले गैंग पर बनते हैं । पर भारत की व्यवस्था इतने सीधे और आराम से किसी निर्दोष पुरुष को न्याय देने के लिए बनायी ही नहीं गयी है । आशा है आप लोग अपने पुरे परिवार पर हुए इस ‘कानूनी आतंकवाद’ के हमले से उबरकर अब जवाबी कार्यवाही करके एक नई मिसाल कायम करेंगे । देश आपकी और आशा पूर्ण नजरों से देख रहा है ।

इंदौर की अदालत में बरी हुए दीप्तांशु शुक्ला, बधाई !

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दैनिक भास्कर, इंदौर के मुखपृष्ठ पर 03.04.15 को प्रकाशित यह खबर हर उस महिलावादी मानसिकता से ग्रस्त वयक्ति के मुंह पर तमाचा है, जो इस पूर्वाग्रह से ग्रस्त है कि सभी महिलाएं जन्म से ही सती – सावित्री और शक्ति-स्वरूपा, अबला आदि – आदि होती हैं ।  जितने वर्ष दीप्तांशु शुक्ला ने अपनी नौकरी गवाने के बाद पुरे परिवार के साथ अपमान और जलालत के साथ गुजारे उसकी भरपाई के लिए कोई भारत में कानून नहीं है । उसके माँ – बाप की सामजिक प्रतिष्ठा और धन की हानि की भरपाई कैसे होगी ? आप में बहुत लोग कानून के जानकार हैं ।। कोई रास्ता सुझाएं |

अपने स्तर पर हम सभी को मिल कर दीप्तांशु शुक्ला और उसके परिवार के लिए राष्ट्रीय वीरता पुरूस्कार की मांग का समर्थन करना चाहिए । जब कोई महिला अपने ऊपर हुए अत्याचार के बाद खुद को ‘सर्वाइवर’ के रूप में प्रस्तुत करती है तो दहेज के फर्जी मुकदमें से बरी हुए इस योद्धा को क्यों नहीं सम्मानित किया जाए । उस फर्जी शिकायत करने वाली ‘अबला नारी’ की निंदा करना भी उतना ही जरुरी है ।

सार्वजनिक माफी मांगी, दहेज प्रताड़ना का फर्जी मुकदमा करने वालों ने

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दहेज प्रताड़ना का फर्जी मुकदमा लिखवाया । पति को सास, ससुर और नन्दों सहित 10 साल तक पुलिस और अदालत में उलझाया । अब मैडम अपने माँ – बाप सहित सार्वजनिक माफी मांग रही हैं । मैडम कह रही हैं की उन्हें उम्मीद है की पति के घर वाले बड़ा दिल रखते हुए उसे माफ कर देंगे । जय हो भारत की अबला नारी । सावधान ! इसमें में भी कोई चाल होगी ।

बिहार में ‘मृत’ महिला दिल्ली में प्रेमी संग जीवित मिली

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हिन्दुस्तान टाइम्स दिल्ली में दिनांक 27-12-2014 को प्रकाशित यह समाचार यह बता रहा की महिल सशक्तिकरण अब किसी निर्दोष को जेल भेजने और सामाजिक रूप से तिरस्कृत करवाने से भी बाज नहीं आ रहा है ।   इसके पूर्व भी उत्तर प्रदेश के उरई में दो बहनों की ‘हत्या’ की खबर से उपजी हिंसा में आधा शहर जला दिया गया । प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी निलम्बित हुए । लड़कियों  के पिटा ने दोनों के शवों की पहचान भी कर ली ।  बाद में दोनों बहनें दिल्ली से जीवित मिली ।
एक वाकया जौनपुर का भी है जिसमें एक लड़की की हत्या के आरोप में बाप – बेटा बाकायदा सजा पा गए  । बाद में वो लड़की मुम्बई में अपने प्रेमी के साथ मिली ।।
क्योंकि कानूनन महिलाओं को ऐसे मामलो में सजा का प्राविधान नहीं है इसलिए भारत में महिलाओ के द्वारा फर्जी मुकदमें दर्ज करा कर कानून का दुरूपयोग  और धन  उगाही की  जा रही   है  ।

कोई इंडिया गेट पर मोमबत्ती जलाने चलेगा क्या ?