लिंग भेदी अस्मिता / Gender Discrimination in Male Assesstion

दहेज के फर्जी मुकदमें में मुर्दे भी नामज़द !

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यही है असली इंडिया ! देश की राजधानी से सटे और हाई-टेक माने जाने वाले गुड़गांव में एक व्यक्ति अपनी पत्नी से तंग आकर आत्महत्या करता है तो अबला मैडम पति के मरने के बाद जाकर हापुड़ में दहेज का फर्जी मुकदमा लिखा देती है । जिसमें मरे हुए पति को भी नामज़द कर लेती है ।

ज़िंदा लोगों पर ऐसे फर्जी मुकदमें का संकट तो सबको पता था पर अब हिन्दुस्तान में मुर्दे भी सुरक्षित नहीं रहे । क्या कोई खट्टर, मोदी या अखिलेश सुन रहा है ? है कोई माई का लाल ?

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इस अबला कैदी के आगे सभी नत – मस्तक हैं

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नवभारत टाइम्स, लखनऊ में दिनांक 15-04-2015 को प्रकाशित इस खबर का मुलाहिजा कीजिये । देखिये कैसे एक अबला नारी ‘डान-गिरी’ के आगे पूरी जेल व्यवस्था ध्वस्त है । आखिर सशक्तिकरण की बयार जेल तक क्यों न पहुंचे ? है किसी ओरिजिनल माई के लाल में हिम्मत जो मैडम की अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगा सके । अगर आपने ओरिजिनल माँ का दूध पीया हो जेल विभाग से इनाम मिलना पक्का ।

वो सूत्र याद आ रहा है – यत्र नारि पूज्यते … 
प्रणाम देवी ।

Men asking justice from Women’s Commission

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दिनांक 14.04.2015 को हिदुस्तान के ऋषिकेश संस्करण में छपी यह खबर तो बस एक बानगी भर है । वास्तव में हर पुरुष इस तुर्रे के निचे दबा होता है कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ । जितना भी दर्द छलक कर बाहर आया है वो तब हुआ होगा जब सारे आंसू भी सूख गए होंगे । आप स्वयं अपने पर बीते तो कल्पना कर के देखिये की मर्द को रोने के लिए कितने गहरी प्रताड़ना सहनी पड़ी होगी ।। मर्द का दर्द पहिचानिए । उसके प्रति भी सम्वेदनशील बनिए ।
औरतें भी अपराधी होती हैं इस बात स्वीकार्यता अभी समाज में कम है । पर अब बात निकली है तो दूर तलक जाए, ऐसा हमारा प्रयास है ।

Man forced to live in bus stop by wife gets divorce

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यही काम अगर किसी पति ने किया होता तो क्या सिर्फ तालाक देकर अदालते उसकी जान बख्श देती ? लिंग भेदी कानूनों के विरुद्ध आवाज बुलन्द करें ।

पुरुष / पति की आत्महत्या का कोई पुरसाहाल हाल नहीं

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अमर उजाला – लखनऊ – दिनांक 05-04-2015.
भारत में अपराध के आंकड़े आधिकारिक रूप से एकत्र करने वाली देशव्यापी संस्था ‘नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो’ की रिपोर्ट बताती हैं की विवाहित पुरुषो  की आत्महत्या डर (65000 लगभग) विवाहित महिलाओ की आत्महत्या डर (28000 लगभग) से दुगनी से भी ज्यादा है । विवाह की व्यवस्था में जब क्षय होता है तो स्त्री और पुरुष सामान्य रूप से प्रभावित होते हैं । यह बात सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर तो स्वीकार्य है पर कानून के स्तर पर यह बात सिरे से नकारी जाती है ।

एक और जहाँ महिलाओं को अपनी दुश्वारी कहने के तमाम कानून और संस्थाएं उपलब्ध हैं वहीँ पुरुषों के लिए विधिक स्तर पर अपनी बात कहने किसी प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं हैं । महिला थाना, परिवार समाधान केंद्र, घरेलू हिंसा अधिनियम, दहेज प्रतिषेध अधिनियम, भारतीय दण्ड विधान, अपराध प्रक्रिया विधा आदि सभी में महिलाओं के हित के हजारो रास्ते हैं । पुरुषो के लिए कुछ भी नहीं ।

समानता का अधिकार नैसर्गिक रूप से सभी को मिला है । फिर लिंग भेदी कानून और संस्थाओं को बना कर  क्यों पुरुषों को इस बराबरी हक से वंचित रखने के पीछे कौन सी शाजिश है ?

इस समाचार में अगर महिला ने अपने मइके में भी आत्महत्या की होती तो सब मिलकर  घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने आदि के मुकदमें दर्ज हो जाते । अब देखना यह है की इस आत्महत्या का कौन सा मुकदमा दर्ज होता है।

अगर यह जिलाधिकारी न होते हो क्या सफाई देने का मौक़ा मिलता ?

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हिंदुस्तान – लखनऊ । दिनांक 05.04.2015 ।
महिला कानूनों दुरूपयोग का यह आलम है कि अब कोई भी सुरक्षित नहीं है । सभी आम और ख़ास, पुरुष निशाने पर हैं । इस खबर में अगर आरोपी पुरुष जिलाधिकारी नहीं होता तो भी क्या उसे अपनी सफ़ाई देने का मौका मिलता ? जो रवायत इस देश में चल रही है उसमे तो बिना सच्चाई जाने सिर्फ आरोप मात्र लग जाने से ही पुरुषों को दोषी मान लेने का चलन है ।  नौकरी से निलम्बन, पुलिस – कचहरी के चक्कर और समाजिक तिरस्कार सब एक साथ मिलता है ।

आज कार्यालय में भी महिला कानूनों का दुरूपयोग खुलेआम हो रहा है । आफिस की हर छोटी – बड़ी बात कब ‘महिला उत्पीड़न’ और ‘कार्य स्थल पर यौनिक अत्याचार’ के मुकदमें में बदलकर लौटेगी,  इसी भय में भारत के हर कार्यालय में लोग भयाक्रांत हैं । उससे भी बड़ी समस्या यह है की जब यह मुकदमें झूठे साबित होते हैं तो फर्जी शिकायत करने वाली शातिर महिला पर कोई कार्यवाही नहीं होती । कानून में फर्जी शिकायत करने वालों पर दण्ड का प्राविधान नहीं होने की कमी के कारण महिलाओं में फर्जी मुकदमें दर्ज कराने की प्रवृत्ति की बाढ़ आ चुकी है । समाज में यह कुरीति एक विकराल रूप ले चुकी है ।

इंदौर की अदालत में बरी हुए दीप्तांशु शुक्ला, बधाई !

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दैनिक भास्कर, इंदौर के मुखपृष्ठ पर 03.04.15 को प्रकाशित यह खबर हर उस महिलावादी मानसिकता से ग्रस्त वयक्ति के मुंह पर तमाचा है, जो इस पूर्वाग्रह से ग्रस्त है कि सभी महिलाएं जन्म से ही सती – सावित्री और शक्ति-स्वरूपा, अबला आदि – आदि होती हैं ।  जितने वर्ष दीप्तांशु शुक्ला ने अपनी नौकरी गवाने के बाद पुरे परिवार के साथ अपमान और जलालत के साथ गुजारे उसकी भरपाई के लिए कोई भारत में कानून नहीं है । उसके माँ – बाप की सामजिक प्रतिष्ठा और धन की हानि की भरपाई कैसे होगी ? आप में बहुत लोग कानून के जानकार हैं ।। कोई रास्ता सुझाएं |

अपने स्तर पर हम सभी को मिल कर दीप्तांशु शुक्ला और उसके परिवार के लिए राष्ट्रीय वीरता पुरूस्कार की मांग का समर्थन करना चाहिए । जब कोई महिला अपने ऊपर हुए अत्याचार के बाद खुद को ‘सर्वाइवर’ के रूप में प्रस्तुत करती है तो दहेज के फर्जी मुकदमें से बरी हुए इस योद्धा को क्यों नहीं सम्मानित किया जाए । उस फर्जी शिकायत करने वाली ‘अबला नारी’ की निंदा करना भी उतना ही जरुरी है ।

क्या इस ’अबला नारी’ पर कोई कानून वाला कार्यवाही करने की हिम्मत करेगा ?

मोहतरमा पहले से ही शादी-शुदा थी और फिर भी एक ’नया बकरा’ हलाल करने निकल पड़ी । आज यह बहुत ही आम बात है, जिसमें महिलाएं एक से अधिक शादियां कर रही हैं । वो भी बिना पूर्व तलाक लिये हुये । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के कानून (आई.पी.सी.) में ऐसी महिला अपराधियों को सजा देने का कोई प्राविधान नहीं है । अलबत्ता, इस महिला अपराधी के ’नये पति’ को सजा का प्राविधान जरूर है । अब कपट करे ’अबला महिला’ और सजा पाये बेचारा ’निर्दोष पुरुष’ । न पुलिस, न अदालते और न समाज – ऐसी महिला अपराधियों को कोई सजा दिलवाने के लिये पहल नहीं करता ।

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बिहार में ‘मृत’ महिला दिल्ली में प्रेमी संग जीवित मिली

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हिन्दुस्तान टाइम्स दिल्ली में दिनांक 27-12-2014 को प्रकाशित यह समाचार यह बता रहा की महिल सशक्तिकरण अब किसी निर्दोष को जेल भेजने और सामाजिक रूप से तिरस्कृत करवाने से भी बाज नहीं आ रहा है ।   इसके पूर्व भी उत्तर प्रदेश के उरई में दो बहनों की ‘हत्या’ की खबर से उपजी हिंसा में आधा शहर जला दिया गया । प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी निलम्बित हुए । लड़कियों  के पिटा ने दोनों के शवों की पहचान भी कर ली ।  बाद में दोनों बहनें दिल्ली से जीवित मिली ।
एक वाकया जौनपुर का भी है जिसमें एक लड़की की हत्या के आरोप में बाप – बेटा बाकायदा सजा पा गए  । बाद में वो लड़की मुम्बई में अपने प्रेमी के साथ मिली ।।
क्योंकि कानूनन महिलाओं को ऐसे मामलो में सजा का प्राविधान नहीं है इसलिए भारत में महिलाओ के द्वारा फर्जी मुकदमें दर्ज करा कर कानून का दुरूपयोग  और धन  उगाही की  जा रही   है  ।

कोई इंडिया गेट पर मोमबत्ती जलाने चलेगा क्या ?

लड़कियां OLX पर बेच रही ब्वायफ्रेन्ड !

नव भारत टाइम्स, लखनऊ, 12.11.2014

नव भारत टाइम्स, लखनऊ, 12.11.2014

अगर यही काम किसी लड़के ने किया होता हो सभी महिल संगठन सड़कों पर उतर आते कि लड़कियां बेची जा रही हैं । तमाम धरना – प्रदर्शन आदि शुरु हो जाते ।और हमारे देश की कर्मठ पुलिस उस लड़के को, और उसके दिवंगत पुरखों तक पर मुकदमा दर्ज हो गया होता । पर यही अपराध जब किसी महिला ने किया तो उसके साथ उदार बर्ताव क्यों ? #EqualPunishmentForEqualCrime की बात बराबरी के झण्डाबदरों के गले क्यों नहीं उतर रझीं>

परन्तु पुरुषों को बेचा जाना क्या कानूनन अपराध नहीं है ? इस पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं हो रही ? लड़कों की अस्मिता का कोई मोल नहीं है ।